इस्लाम मेरा आज का अनुभव

IIT के छात्रों का कुबूल -ए- इस्लाम : अज़ीम ख़ान

भूमिका:

आईं आई टी के कुछ छात्र जिनसे एक मौलाना साहब की इस्लाम की बुनियादी शिक्षाओं और आधुनिक माडर्न दौर में उसकी महत्ता एवं विश्वसनीयता को लेकर गुफ्तगू हुई, इस ग़ुफ़्तगू व संवाद को हमारे एक साथी मुहम्मद अज़ीम ख़ान‌ ने क़ाराम के लिए लिखित रूप दिया है, हम इसको प्रकाशित कर रहे हैं।

इसमे मौलाना ने जिस तरह बुनियादी शिक्षाओं को क़ुरान की रौशनी में पेश किया है उस हद तक बात काफ़ी ठीक है, लेकिन ज़्यादा फ़ोकस उन्होंने क़ुरान की उन‌ आयतों पर किया है जिसमें साइंसी आविष्कारों एवं ईजादों की तरफ़ इशारे मिलते हैं। और यूं लगता है कि उन नौजवानों के इस्लाम क़बूल करने का कारण यही साइंस और क़ुरान का आपसी संबंध था।

इसमें अगर देखा जाये तो हर्ज भी नहीं लगता कि साइंस के आविष्कारों,उसकी खोजों को क़ुरान‌ से निकालकर दिखाया जाये और ये कहा जाये कि”1400 साल पहले क़ुरान ने वह बात कह दी थी जो साइंस आज कह रहा है”।

लोगों का अच्छा ख़ासा तब्क़ा इस तरीक़े से ही प्रभावित होता है। लेकिन अगर थोड़ा ध्यान दिया जाये तो एक सतह के बाद लोगों को इस तरह की दलीलें प्रभावित करने के बजाय नकारात्मक असर डाल सकती हैं, खास तौर पर ये कहा जा सकता है कि “अगर क़ुरान ने सब पहले ही बता दिया था तो फिर क़ुरान वालों ने क्यूं नहीं इसको दरयाफ़्त( खोज) कर लिया? 

दूसरा जो निगेटिव या नकारात्मक संदेश जा सकता है वह ये कि साइंस में फ़ेक्टस और थ्योरी में फ़र्क़ करना ज़रूरी है, फिर ये देखना भी आवश्यकता है कि फ़ेक्टस किस दर्जे के हैं? क्या ऐसे हैं कि जिनके विरूद्ध जाया नहीं जा सकता जिनमें तब्दीली नामुमकिन एवं असंभव है, या फिर ऐसा मुमकिन है कि कुछ अरसे के बाद इसमें बदलाव हो जाये।

तो ज़ाहिर है कि ऐसे नज़रिये की बेस पर क़ुरान की आयतों की व्याख्या मुनासिब नहीं होगी। क्योंकि कुछ समय बाद जब वह थ्योरी रद्द होकर दूसरी थ्योरी चल जायेगी तो ये एक बड़ी तादाद के विश्वास को हिला सकती है, खास तौर पर उन लोगों को जिन्होंने इसी बेस पर इस्लाम अपनाया था। और विरोधियों की नज़र में इसकी वेल्यू दूसरी धार्मिक किताबों जैसी हो जायेगी, क्योंकि दूसरे मज़हब के लोग भी बहुत सी वैज्ञानिक खोजों एवं आविष्कारों को अपनी पवित्र किताबों से ही निकली हुई बताते हैं।

तो क्या फिर यूं ही रहने दिया जाये? साइंस और माडर्न डिस्कोर्स,जिन सच के तलाश करने वाले प्यासे ज़हनों पर हावी है,उनकी तसल्ली,तब्लीग़ और दावत की व्यवस्था कैसे हो?

 इस सिलसिले में साइंस और दीन के माहिरीन ज़्यादा बेहतर रहनुमाई कर सकते हैं,हमने अपने बड़ों और जानने वालों से जो कुछ सुना है उसका ख़ुलासा यह है कि हमें क़ुरान की आयतों की सही व अंतिम व्याख्या वही माननी चाहिए जो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से साबित हो। लेकिन अगर शब्दों में गुंजाइश हो तो उससे दूसरी चीज़े भी संभावना व इमकान के दर्जे में उस समय बयान की जा सकती हैं जब उन चीज़ों का वास्तविक होना क्लीयर हो जाये।

फिर क़ुरान की आयत को बिल्कुल उस वैज्ञानिक खोज व आविष्कार ही की असल न माना जाये बल्कि इतना कहा जाये कि ये उसूल सारी दुनिया के बुद्धिजीवी व दानिश्वर मानते हैं कि जब भी कोई व्यक्ति किसी विषय में डायरेक्ट बात न करके दूर-दूर से ही उसके बारे में कुछ बयान करता है तो अगर उसको उस विषय पर जानकारी नहीं है,और न ही भरपूर पकड़ है तो वह व्यक्ति ज़रूर ऐसी ग़लती करेगा जिससे जानने वालों को पता चल जायेगा कि इसे इस विषय में कुछ भी मालूम नहीं है।

उदाहरण के तौर पर अगर कोई व्यक्ति अंग्रेजी भाषा न जानता हो और वह अपनी स्पीच में या लेखन में अंग्रेज़ी के कुछ शब्द प्रयोग करने लगे तो उसकी पोल जल्द ही खुल जायेगी, मसलन उम्मीदवार के बजाय अगर वह candidate कहे तो “केंडीडेट” जो सही उच्चारण है की जगह “कंडीडेट” कह सकता है। ये एक मामूली सी रोज़मर्रा की मिसाल है। लेकिन इससे ये समझ में आ जाता है कि विषय की बिल्कुल जानकारी न होना या कम जानकारी होना देर-सवेर खुल जाता है,कोई थोड़ा आगे चलकर लड़खड़ाता है कोई बेसिक्स में ही गिर पड़ता है।

अब देखिए क़ुरान एक ऐसी हिदायत और दिशा-निर्देश की किताब है जिसका मक़सद इंसान को ईश्वर से मिलाना है,और इसके लिए जो ज़रुरी गाइडेंस उसे दुनिया में ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए चाहिए उसको वह गाइडेंस देनी है, इसलिए इसमें डायरेक्ट तरीक़े पर न तो साइंसी खोजों व आविष्कारो का ज़िक्र है न ही इसकी आवश्यकता न क़ुरान में दावा करता है।

लेकिन चूंकि पूरी दुनिया आपस में एक-दूसरे से “कनेक्टेड” है,और ख़ुदा इंसान को अपनी तरफ़ बुलाने के लिए ख़ुद इंसान को अपने अन्दर और बाहर( दुनिया व ब्रह्माण्ड) में फैली हुई सैकड़ों निशानियों में ग़ौर करने की दावत देता है इसलिए उसने ऐसे अल्फ़ाज़ इस्तेमाल किये हैं जो इस दुनिया के बहुत से उन प्राकृतिक एवं फ़ितरी दृश्यों एवं नज़ाऱो( phenomenas) को बयान‌ करता है,जिनमे ग़ौर करके इंसान ख़ुदा की तरफ़ पलट सके,इसमें इंसान की पैदाइश, चांद-सूरज की गर्दिश,पहाड़ों, दरियाओं, सितारों,आग-पानी और पूरी कायनात (ब्रह्माण्ड)की उत्पत्ति जैसे विषयों का बयान आ जाता है,और चूंकि ये सब चीज़ें अलग-अलग साइंसी तहकीकात का विषय रही हैं इसलिए इस तरह क़ुरान इन उलूम( sciences) को “टच” करता हुआ चलता है, और जैसा कि ऊपर लिखा गया क़ुरान का कोई शब्द,कोई बयान भी साईंसी “फेक्ट” के ख़िलाफ़ नहीं जाता। ये एक बहुत बड़ी दलील उसके ख़ुदा की किताब होने की है।

अगर ये इंसान की लिखी किताब होती तो इसमें कहीं न कहीं कोई न कोई शब्द या वाक्य ऐसा आ जाता जो मौजूदा दौर के आधुनिक ज्ञान के विरूद्ध होता,जिससे इसकी पोल खुल जाती।

तीसरी बात इस सिलसिले में ये कहीं जा सकती है कि क़ुरान भेजने वाली हस्ती और ब्रह्मांड को पैदा करने वाली हस्ती चूंकि एक है,इसलिए इनमे इंतिहाई दर्जे की समानता है,और क़ुरान अपने मानने वालों से ग़ौर,फ़िक्र और चिंतन की अपेक्षा ही नहीं करता उन्हें इसका हुक्म भी देता है, लेकिन ये चिंतन-मनन असल में दुनिया की भौतिक माद्दी तरक़्क़ी को असल मकसद मानकर नहीं करना है, बल्कि इसको अपनी ज़िंदगी के मक़सद यानी ख़ुदा से ताल्लुक़ और उसकी इच्छा अनुसार जीवन व्यतीत करने के लिए करना है,तो अगर किसी को सिर्फ़ ज़ाहिरी तौर पर हल्की सी फ़िक्र से ये मक़सद हासिल हो जाते तो उसकी ड्यूटी खत्म है जाती है,आगे का चिंतन ऐसे लोगों के लिए ज़रूरी है जिनको ज़ाहिरी नज़ारों और बेसिक ग़ौर फ़िक्र से ये मक़सद हासिल न हुआ।

 इस भूमिका के बाद अब वह मज़मून पढिये

मैं अपने कमरे में दाखिल हुआ तो मैंने देखा कि मोबाइल पर मेरे दोस्त ने एक वीडियो भेजा है जिसमें एक यूट्यूब लिंक दिया हुआ है जैसे ही मैंने लिंक को ओपन किया उसमें एक मौलाना अपनी एक गुफ़्तगू को बता रहे थे जो उन्होंने आईआईटी मुंबई के तीन इंजीनियरिंग के स्टूडेंट से की थी। दरअसल स्टूडेंट्स दिल्ली घूमने के लिए आए हुए थे और और वे इंडिया गेट के पास एक पार्क में बैठे हुए थे मौलाना का वहां से गुज़र हुआ तो उन्होंने सोचा कि इनसे कुछ बात कर ली जाए।

मौलाना ने ख़ैरियत पूछने के बाद बात शुरू की, उन्होंने बताया कि: “मेरा नाम अब्दुल्लाह (परिवर्तित नाम)है और मैं एक मुसलमान हूं,मैं चाहता हूं कि मैं आपसे इस्लाम धर्म के बारे में बात करूं ताकि लोगों ने जो इस्लाम धर्म के बारे में ग़लत धारणाएं बना रखी हैं,उनसे अगर आप भी प्रभावित हों तो उन्हें दूर किया जा सके,और इस्लाम की हक़ीक़त को बताया जा सके”।

लड़के पढ़े लिखे और समझदार थे जैसा कि मैं बता चुका हूं इसलिए उन्होंने कहा कि: “आप हमसे बात कर सकते हैं”।
मौलाना ने बताया कि इस्लाम धर्म जिस बुनियाद पर टिका हुआ है वह यह है कि:
‘तुम्हारा ख़ुदा एक ही ख़ुदा है। उस रहमान और रहीम के सिवा कोई और ख़ुदा नहीं है।’ 1
‘मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं’ 2
यानी ईश्वर एक है और निराकार है और मुहम्मद उसके आख़िरी रसूल हैं ।
उन्होंने बताया कि क़ुरान अल्लाह की आख़िरी किताब है जो अल्लाह के रसूल पर उतारी गई है।
क़ुरान में अल्लाह कहता है कि:
‘मैंने जिन्न और इन्सानों को इसके सिवा किसी काम के लिये पैदा नहीं किया है कि वे मेरी बन्दगी करें।’3
यानी सिर्फ़ अपनी इबादत व आराधना के लिए ही मैंने उनको पैदा किया है।

एक दूसरे स्थान पर कहा गया है:

‘जिसने मौत और ज़िन्दगी को बनाया ताकि तुम लोगों को आज़माकर देखे कि तुममें से कौन बेहतर अमल करनेवाला है, और वह ज़बरदस्त भी है और दरगुज़र(क्षमा) करनेवाला भी।’4

यानी ईश्वर ने हमें यहां पर इसलिए भेजा है ताकि वह जान सके(व्यवहारिक रूप से भी) कि हम में कौन अच्छे काम करने वाला है और कौन अच्छाई की दावत देने वाला है यानी अच्छाई की तरफ़ बुलाने वाला है ।

‘तुममें कुछ लोग तो ऐसे ज़रूर ही रहने चाहिएँ जो नेकी की तरफ़ बुलाएँ,भलाई का हुक्म दें और बुराइयों से रोकते रहें। जो लोग ये काम करेंगे,वही कामयाब होंगे।’5

कुरान कहता है एक दिन सब कुछ तबाह हो जाएगा।

‘जब वह होने वाला वाक़िआ पेश आ जाएगा। तो कोई उसके श आ जाने को झुटलानेवाला न होगा। वह उथल-पुथल कर देने वाली आफ़त होगी। ज़मीन उस वक़्त यकायक हिला डाली जाएगी। और पहाड़ इस तरह टुकड़े-टुकडे कर दिये जाएँगे। कि बिखरे हुए ग़ुबार बनकर रह जाएँगे”। 6

और फिर उस दिन इंसानों को तमाम इंसानों को दोबारा से जिंदा किया जाएगा। तो उसके बारे में क़ुरान का बयान देखिए:

‘जिस दिन हम इन सबको इकट्ठा करेंगे और मुशरिकों (बहु श्वेरवादियो) से पूछेंगे कि अब वे तुम्हारे ठहराए हुए शरीक कहाँ हैं जिनको तुम अपना ख़ुदा समझते थे।’7

और तराज़ू को स्थापित कर किया जाएगा ताकि इंसाफ किया जाए,जो लोग ईश्वर के नजदीक अच्छे होंगे उन्हें जन्नत (स्वर्ग) भेज दिया जाएगा और जो लोग ईश्वर के पैमाने के अनुसार यानी अल्लाह के नज़र में बुरे होंगे उन्हें जहन्नम (नर्क) भेज दिया जाएगा।

‘रहे वे लोग जो ईमान ले आएँ और अच्छे काम किये, तो उन्हें हम ऐसे बाग़ों में दाख़िल करेंगे जिनके नीचे नहरें बहती होंगी और वे वहाँ हमेशा- हमेशा रहेंगे। यह अल्लाह का सच्चा वादा है और अल्लाह से बढ़कर कौन अपनी बात में सच्चा होगा।’8

‘इन मुनाफ़िक़ मर्दों और औरतों और काफ़िरों [इनकार करनेवालों] के लिए अल्लाह ने जहन्नम की आग का वादा किया है, जिसमें वह हमेशा रहेंगे, वही इनके लिए मुनासिब है. उनपर अल्लाह की फटकार है और उनके लिए बरक़रार रहने वाला अज़ाब है।’9

क़ुरान इन तमाम बातों के अलावा जिंदगी की तमाम बातों पर भी संवाद करता है,और एक बेहतरीन तरीक़ा बताता है जिसकी रहनुमाई और दिशा-निर्देश हमें स्वयं क़ुरान से और पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िंदगी से मिलती है।

लड़के: “हम आपकी बात पर क्यों यक़ीन करें।
हो सकता है कि आप झूठ बोल रहे हो आपके पास क्या सुबूत है कि आप सच बोल रहे हैं”?

मौलाना: “मैं आपको वही बातें बता रहा हूं जो क़ुरान में लिखी हुई है और क़ुरान अल्लाह का है,यानी एक अकेले ऐसे ईश्वर की तरफ़ से जिसके हम पल्ला कोई भी नहीं है वह अकेला है”।

लड़के: “क़ुरान को हम सच्ची किताब ही नहीं मानते। क़ुरान तो एक इंसान ने लिखा था”।

मौलाना : मुहम्मद साहब ( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)तो उम्मी थे यानी किताबों से पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे, देखिए क़ुरान कहता है:
‘[तो आज ये रहमत उन लोगों का हिस्सा है] जो इस पैग़म्बर, उम्मी नबी की पैरवी इख़्तियार करे जिसका ज़िक्र उन्हें अपने यहाँ तौरात(Old testament) और इंजील((New Testament) में लिखा हुआ मिलता है वह उन्हें नेकी का हुक्म देता है, बुराई से रोकता है, उनके लिए पाक चीज़ें हलाल और नापाक चीज़ें हराम करता है,और उन पर से वह बोझ उतारता है जो उनvपर लदे हुए थे, और उन बन्धनों को खोलता है जिनमें वे जकड़े हुए थे, इसलिए जो लोग उस पर ईमान ले आयें और उसकी हिमायत और मदद करें और उस रौशनी की पैरवी करें जो उसके साथ उतारी गई है, वही कामयाब होनेवाले है।’10

मौलाना ने आगे कहा: “अगर मैं साबित कर दूं कि क़ुरान ईश्वर की तरफ़ से उतारी गयी किताब है तो क्या फिर आप यक़ी करेंगे”?

लड़के साइंस की नॉलेज रखने वाले समझदार थे इसलिए उन्होंने कहा: “हां! हम यकीन कर लेंगे’।

मौलाना: “क्या किसी भी किताब को पढ़कर उसके लिखने वाले के इल्म और अक़्ल का अंदाजा किया जा सकता है”?
लड़के: “हां! बिल्कुल किया जा सकता है”।
मौलाना: “तो फिर बताइए 1400 साल पहले साइंस ने कितनी तरक़्क़ी कर रखी थी”?
लड़के: “उस वक़्त बिल्कुल भी तरक़्क़ी नहीं की थी”।
मौलाना: “क्या आप सोच सकते हैं कि 14 सौ साल पहले एक अनपढ़ आदमी यह बता दे या अपनी किताब में यह लिख दे कि यूनिवर्स एक्सपेंड हो रही है”?

लड़के: ” नहीं! यह बात तो बीसवीं शताब्दी के शुरू में रूस के भौतिकविद(Physicist) Alexander Friedmann और बेल्जियम के खगोल वैज्ञानिक(Astronomer) Georges Lemaître ने सैद्धांतिक रूप से पता किया कि ब्राह्मण फैल रहा है। और इसकी खोज 1929 में अमेरिकी खगोल विज्ञानी Edwin Hubble ने की”। a

मौलाना: “लेकिन यह बात 1400 साल से कुरान में लिखी हुई है कि:
‘आसमान को हमने अपने ज़ोर से बनाया है और हम फैला रहे हैं।’11

मौलाना यह बताईये: “हम फिंगरप्रिंट टेक्नोलॉजी का कब से इस्तेमाल कर रहे हैं”?
लड़कों: “100 सालों से। Andre A. Moenssens ने अपनी किताब फिंगरप्रिंट टेक्निक्स मैं विश्लेषण किया है कि प्रत्येक इंसान का फिंगरप्रिंट अलग होता है और कोई भी दो फिंगरप्रिंट समान नहीं होते”। b

मौलाना: क़ुरान कहता है:
“क्या इनसान ये समझ रहा है कि हम उसकी हड्डियों को जमा न कर सकेंगे? क्यों नहीं? हम तो उसकी उंगलियों की पोर-पोर तक ठीक बना देने पर क़ादिर हैं।’12

आज आप जानते हैं कि हर एक इंसान की फिंगरप्रिंट अलग अलग होती है। इस बात का 1400 साल पहले बताया जाना हैरतअंगेज है।

मौलाना ने स्टूडेंट से पूछा : “ब्रह्मांड कैसे बना?
स्टूडेंट्स ने बिग बैंग थ्योरी का ज़िक्र किया। जिसके अनुसार:
‘बिग बैंग या ज़ोरदार धमाका, ब्रह्मांड की रचना का एक वैज्ञानिक सिद्धांत है. यह इस सवाल का जवाब देने की कोशिश करता है कि यह ब्रह्मांड कब और कैसे बना. इस सिद्धांत के अनुसार, कोई 15 अरब वर्ष पहले समस्त भौतिक तत्व और ऊर्जा एक बिंदु में सिमटी हुई थी. इससे पहले क्या था, यह कोई नहीं जानता. फिर इस बिंदू ने फैलना शुरू किया. बिग बैंग, बम विस्फोट जैसा विस्फोट नहीं था बल्कि इसमें, प्रारंभिक ब्रह्मांड के कण, समूचे अंतरिक्ष में फैल गए और एक दूसरे से दूर भागने लगे. इस सिद्धांत का श्रेय ऐडविन हबल नामक वैज्ञानिक को जाता है जिन्होंने कहा था कि ब्रह्मांड का निरंतर विस्तार हो रहा है. जिसका मतलब ये हुआ कि ब्रह्मांड कभी सघन रहा होगा”।’c

मौलाना ने कहा क़ुरान कहता है:

‘क्या वे लोग, जिन्होंने (नबी की बात मानने से) इन्कार कर दिया है, ये ग़ौर नहीं करते कि ये सब आसमान और ज़मीन आपस में मिले हुए थे, फिर हमने इन्हें अलग किया, और पानी से हर ज़िन्दा चीज़ पैदा की? क्या वे (हमारी इस तरह-तरह की चीज़ें पैदा करने की इस सलाहियत को) नहीं मानते?’13
‘फिर उसने आसमान की तरफ़ ध्यान दिया जो उस वक़्त सिर्फ़ धुआँ था। उसने आसमान और ज़मीन से कहा, “वुजूद में आ जाओ, चाहे तुम चाहो, या न चाहो।” दोनों ने कहा, “हम आ गए फ़रमाँबरदारों की तरह।”’14

1400 साल पहले इस तरह की बात का बताना एक हैरतअंगेज़ बात है जिसकी साइंस ने आज खोज की है।
ज़ाहिर हुआ कि क़ुरान अल्लाह की तरफ़ से है।

‘पहले माना जाता था कि पहाड़ पृथ्वी की सतह पर उभर आए हैं लेकिन वैज्ञानिकों ने महसूस किया कि मामला यह नहीं है बल्कि पहाड़ों की जड़ें पहाड़ों से 10 से 15 गुना ज़्यादा गहराई तक हैं।इस तरह पहाड़ खूंटी की तरह काम करते हैं जो कि किसी टेंट को रोकने के लिए लगाई जाती हैं।’d
‘ Dr. Frank Press ने अपनी किताब Earth में लिखा है कि पहाड़ दावं यानी खूंटी की तरह हैं और जमीन के अंदर गहराई तक हैं।’e
पहाड़ों के मामले में कुरान कहता है:
‘और हमने ज़मीन में पहाड़ जमा दिये ताकि वह उन्हें लेकर ढुलक न जाए। और उसमें कुशादा(विस्तृत) रास्ते बना दिये ताकि लोग अपना रास्ता मालूम कर लें।’15

‘उसने आसमानों को पैदा किया बिना सुतूनों(कालम्ज़) के जो तुमको दिखाई दें। उसने ज़मीन में पहाड़ जमा दिये ताकि वे तुम्हें लेकर ढुलक न जाए। उसने हर तरह के जानवर ज़मीन में फैला दिये और आसमान से पानी बरसाया और ज़मीन में तरह-तरह की अच्छी चीज़ें उगा दीं।’16
‘क्या ये वास्तविकता नहीं है की हमने ज़मीन को फ़र्श बनाया,और पहाड़ों को मेख़ों की तरह गाड़ दिया,।’17

जो बात हमें बीसवीं शताब्दी के अंत में modern geological research से पता चली क़ुरान उसे 1400 साल पहले बता चुका।

‘और अल्लाह ने हर जानदार को पानी से पैदा किया,कोई पेट के बल चल रहा है तो कोई दो टाँगों पर और कोई चार टाँगों पर.जो कुछ वो चाहता है पैदा करता है, वह हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है।’18

‘और वही है जिसने पानी से एक इन्सान पैदा किया, फिर उससे नसब (वंश) और ससुराल के दो अलग-अलग सिलसिले चलाए। तेरा रब बड़ा ही क़ुदरतवाला है।’19

क़ुरान कहता है कि हमने हर जानदार को पानी से पैदा किया है। 1400 साल पहले रेगिस्तान में रहने वाला एक इंसान जब हमें यह बताता है तो हमारे लिए एक अचंभा है क्योंकि यह सूक्ष्मदर्शी दूरबीनों से ही पता किया जा सकता था जो कि सालों बाद खोजी गई। इससे पता चला कि क़ुरान इंसान की तरफ़ से नहीं है बल्कि यह अकेले ईश्वर की तरफ़ से है।

क़ुरान इंसान की पैदाइश के बारे में कहता है:
‘फिर उस बूँद को लोथड़े की शक्ल दी, फिर लोथड़े को बोटी बना दिया,फिर बोटी की हड्डियाँ बनाईं, फिर हड्डियों पर गोश्त चढ़ाया,फिर उसे एक दूसरा ही जानदार बना खड़ा किया। तो बड़ा ही बरकतवाला है अल्लाह, सब कारीगरों से अच्छा कारीगर।’20

‘पढ़ो (ऐ नबी!) अपने रब के नाम के साथ जिनसे पैदा किया इन्सान को अलक़( जोंक के मानिंद जमे हुए ख़ून के लोथड़े) से।पढ़ो,और तुम्हारा रब बड़ा करीम है।’21

Keith L. Moore अपनी किताब Developing Human मैं लिखता है:

‘सातवें हफ्ते में हड्डियों का ढांचा भ्रूण की सामान्य स्थिति को निर्धारित करता है। मांसपेशियों का विकास साथ साथ नहीं होता बल्कि बाद में होता है। मांसपेशियों हड्डियों के चारों ओर अपनी जगह बनाती है और हड्डियों को ढक देती है यह आठवें सप्ताह में होता है।’f

प्रारंभिक अवस्था में बच्चा zygote की शक्ल में होता है जो कि पोषण लेने के लिए मां के गर्भाशय से चिपका रहता है।Zygote गोश्त के टुकड़े की तरह दिखता है।अलक़ का मतलब होता है लटकाना या जोंक,जोंक क्योंकि खून चूसने के लिए चिपकती है इसलिए क़ुरान में अलक का शब्द इस्तेमाल हुआ क्योंकि zygote गर्भाशय से चिपका रहता है।
इस सब का जान पाना modern embryology की वजह से हुआ,1400 साल पहले क़ुरान में इसका बयान यह साबित करता है कि क़ुरान अल्लाह की किताब है।
ज़्यादा जानकारी के लिए Keith L. Moore,et al. Human Development as described in the Quran and Sunnah,(Makkah: commission on scientific signs of the Quran and Sunnah,1992)
लड़के: “अब आप हमसे क्या चाहते हैं?
मौलाना: “मैं चाहता हूं कि आप गवाही दे कि ईश्वर एक है उसके सिवा कोई इबादत के क़ाबिल नहीं, और मुहम्मद सल्लललाहु अलयहि वसल्लम अल्लाह के बंदे और रसूल हैं।
लड़के: “हां ! हम गवाही देते हैं”।

References-
1-(2-163)
2-(48-29)
3-(51-56)
4-(67-2)
5-(3-104)
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7-(6-22)
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10-(7-157)
11-(51-47)
12-(75-3,4)
13-(21-30)
14-(41-11)
15-(21-31)
16-(31-10)
17-(78-6,7)
18-(24-45)
19-(25-54)
20-(23-14)
21-(96-1,2,3)
a-(Edwin Hubble,www.time.com)
b-(Andre A. Moenssens,”is fingerprint identification a science?”,www.forensic-evidence.com)
c-(https://www.bbc.com/hindi/news/story/2008/05/080528_askus_big_bang)
d-(prof. Zighloul Raghib El- Naggar,” the miraculous Quran.”)
e-(san Francisco:W.H.Freeman & company.1982.)
f-(W. B. Saunders company:1982.)

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