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बच्चों की घरेलू तालीम कैसे हो? क़ुरान क्लास की एक झलक : उम्मे ख़ालिद,अनुवाद : वसी मियां ख़ान

मुझसे अक्सर ये सवाल किया जाता है कि मैं (अपने बच्चों को) घर पर कैसे पढ़ाती हूं,क्लास का वक्त कितना होता है और ये किस तरह चलती है। इसलिए में यहां सेम्पल के तौर पर एक पीरियड (घंटे) की रूदाद पेश कर रही हूं।

कल हमारी क़ुरान की क्लास थी। हमने पिछली दो सूरतों को दोहराया और फिर आगे के सबक़ में सूरा दहर(सूरा नम्बर 76,सूरा इंसान भी कहते हैं)की आठवीं आयत को पढ़ा। आयत ये है :
وَيُطْعِمُونَ الطَّعَامَ عَلَىٰ حُبِّهِ مِسْكِينًا وَيَتِيمًا وَأَسِيرًا.

“और वे( अल्लाह के करीबी नेक बन्दे ऐसे होते हैं जो)प्रिय होने के बावजूद ज़रूरतमन्द,यतीम और क़ैदी को खाना खिलाते हैं”।

मैंने तीनों बच्चों ( साढ़े सात साल, छः साल और पांच साल की उम्र वाले) को इस आयत का मतलब( तफ्सीर) समझाने के लिए इसको छोटे छोटे हिस्सों में बांटा। इसके भाषायी पहलू को समझाते हुए नये शब्दों का मतलब भी समझाया और फिर पूरी आयत के मैसेज को क्लीयर किया।

“यहां अल्लाह ताला उस पिछली आयत की चर्चा को आगे बढ़ा रहा है जो हमने कल पढ़ी थी,और उसमें ऐसे लोगों के बारे में बताया गया था जिन्होंने दुनिया में अच्छे काम किये और वो जन्नत में जायेंगे। इनमें से कुछ अच्छे कामों को अल्लाह बयान कर चुका है कि वो लोग दुनिया में वादों को पूरा करते हैं,और क़यामत के दिन से डरते हैं”।

अब इस आयत में उनके एक और ऐसे ही नेक काम का जिक्र है। वो ये कि ये ईमानवाले विभिन्न प्रकार के लोगों को खाना खिलाते हैं।

पहला टुकड़ा है ويطعمون الطعام तुम जानते हो طعام (तआम)क्या होता है?

“जैसे खाना” एक बच्चे ने जवाब दिया।

ये सही जवाब है। इसका मतलब खाना ही है। खाना देने के लिए अरबी में یطعم क्रिया( अंग्रेजी में verb उर्दू में फ़अल) का इस्तेमाल किया जाता है। जैसे आप अगर किसी से पीने के लिए कुछ मांगे तो अरबी में इस तरह कहेंगे اسقني (मुझे पिलाओ) इसी तरह अगर आप कहना चाहते हैं कि “मुझे खाने के लिए दो” तो आप अरबी में कहेंगे أطعمني जैसा कि इस आयत में भी यही इस्तेमाल हुआ है।

तो अल्लाह तआला इस आयत में कहा रहा है कि वो लोग खाना खिलाते हैं।

इस पर मेरे साढ़े सात साला के बेटे ने मुंह बनाकर ऐतराज किया : “लेकिन अल्लाह ये क्यूं कह रहा है ويطعمون الطعام ( वे खाना खिलाते हैं) क्योंकि किसी इन्सान को खाने के अलावा और कौन सी चीज खिलाई जा सकती है? ये तो नहीं कह सकते कि “लोहा खिलाते हैं” तो यहां पर खाने का जिक्र करके इसको रिपीट करने( दोहराने) की क्या जरूरत थी। सीधा कह सकते थे कि “वो खिलाते हैं”।

मैंने जवाब दिया : “तुमने बहुत उम्दा सवाल किया है। लेकिन ये याद रखो कि अल्लाह ताला बिला वजह क़ुरान में एक भी लफ्ज़ नहीं लाता, हर एक लफ्ज़ का कोई न कोई सबब होता है। बस हमारा काम ये है कि हम उस ख़ास मकसद और सबब को तलाश करें,उसमें गौर करें कि अल्लाह ने ये लफ्ज़ क्यूं कहा है।

मसलन क़ुरान में जब भी कोई लफ्ज़ या बात दोहराई जाती है तो ये उस पर ज़ोर देने और उसे महत्व देने के लिए दोहराई जाती है। जैसे इस आयत में जब ये कहा कि “वे खाना खिलाते हैं” तो इससे इस बात की तरफ इशारा किया जा रहा है कि वे बहुत ज़्यादा खाना खिलाते हैं,और कभी कभी नहीं बल्कि अक्सर खिलाते हैं। ये उनकी आदत बन चुका है।

अगला लफ्ज़ है على حبه तुममें से कोई इसका मतलब बता सकता है?

“मुहब्बत”, पांच साल वाले ने जवाब दिया।

” सही जवाब है.यक़ीनन ये लोग दूसरों को खाना खिलाते हैं, लेकिन ये कोई बासी खाना नहीं होता जो उन्हें पसंद न हो औश्र उनकी जरूरत से ज़्यादा हो, बल्कि उन्हें इसकी सख्त ज़रूरत होती है, उन्होंने इसे अपने लिए ही तैयार किया होता है। वो इसे खाना खूब पसंद करते।
लेकिन वे इसे खुद न खाकर दूसरों को देते हैं, तुम्हारा क्या ख्याल क्या ऐसा करना आसान है?

“वाकई बहुत मुश्किल है” बच्चों ने इत्तेफ़ाक किया

मैंने मुस्कुराते हुए कहा : “ज़रा ख़्याल करो कि तुम्हें सख्त भूक लगी हो,और तुम मुझे अपना पसंदीदा खाना बनाते हुए देख रहे हो, और इसकी मज़ेदार खूशबू भी महसूस कर रहे हो। लेकिन जैसे ही खाना तैयार हुआ हमने सारा का सारा किसी ओर को खाने के लिए दे दिया। और हमारे खाने के लिए बचा हुआ बासी खाना रह गया। बताओ ऐसा करना आसान है या मुश्किल?

इस पर बच्चों ने जो मुंह बनाया उसे देखकर मुझे हंसी आ गयी, क्योंकि उनकी पसंदीदा मिस्त्री डिश मैं कभी कभार ही बनाती हूं। वजह ये है कि इसमें वक्त बहुत लगता है।

तो ये मुसलमान अपना सबसे बेहतरीन और पसंदीदा खाना दूसरों को देते हैं। वे सिर्फ रूखी सूखी रोटी किसी के आगे रखकर ये नहीं कह देते कि ये खाना खा लो। बल्कि अपनी पसंदीदा डिश खुद न खाकर दूसरों को देते हैं। ये इंसान के लिए बहुत मुश्किल है, क्योंकि उसका नफ़्स हमेशा खुद की फ़िक्र में लगा रहता है और अपनी ज़ात को छोड़कर दूसरे को तरजीह देना बड़ा भारी गुज़रता है। नफ़रत हमेशा ख़ुदग़र्ज़ बनने के लिए उकसाता है‌। लिहाज़ा ख़ुद को महरुम करके दूसरो को बेहतर चीज दे देना बड़ा मुश्किल है। लेकिन ये हमारे लिए बहुत अच्छा है।और अल्लाह ऐसे लोगों से मुहब्बत करता है।इस आयत के अन्दर भी वो ऐसे लोगों की तारीफ कर रहा है।

इसके बाद अल्लाह ने तीन‌ मुख़्तलिफ़(विभिन्न) कैटगरी के लोगों का ज़िक्र किया है जिनको ये नेक मुसलमान अपना पसंदीदा खाना खिलाते हैं।

1) मिस्कीन : यानी ऐसा ज़रूरतमन्द जिसके पास न खर्च के लिए पैसा हो न खाने के लिए रोटी वग़ैरह हो। और ये भी मुमकिन है कि रहने के लिए घर भी न हो।

“अच्छा आप इसी तरह के लोगों की बात कर रहीं हैं न जो हमें शहर जाते हुए कभी कभी रास्ते में मिलते हैं, ठीक है न ममा?” छः साल वाले बच्चे ने कहा

“हां ऐसे ही लोग। वे गरीब और घर से महरूम हैं, सोने और रहने के लिए कोई जगह उनके पास नहीं है,और अक्सर खाने के लिए भी बहुत थोड़ा ही मिल पाता है। ये लोग मिस्कीन ही माने जायेंगे।

2) यतीम : दूसरी किस्म है यतीम। हम यतीमों के बारे में पहले भी बहुत बात कर चुके हैं। क्या तुम बता सकते हैं कि यतीम कौन है ? मैंने तीनों में सबसे छोटे 5 साला बच्चे से सवाल किया। मकसद ये जानना था कि उसे बुनियादी बातें याद भी है कि नहीं और आज के सबक में वो किस हद तक साथ चल रहा है।

“एक ऐसा लड़का या लड़की जिसके मां बाप ने हों” उसने जवाब दिया।

“बिल्कुल सही. तुम क्या समझते हो ऐसा बच्चा जिसके मां बाप इस दुनिया से चले गये हों उसे मदद की ज़रूरत पड़ेगी कि नहीं ?”

“उसे बहुत ज़्यादा मदद की ज़रूरत होगी” उसने सहमति ( ताईद) में सर हिलाकर कहा

“बढ़िया. इसी वजह से अल्लाह ने हमें बार बार यतीमो की मदद करने की याद दिलाई है। उन्हें हमारी मदद की ज़रूरत है।

3) जंग का क़ैदी : तीसरी क़िस्म या कैटगरी जिसको ये नेक मुसलमान खाना खिलाते हैं वो “असीर” या जंगी कैदी( बंदी) है। मेरे ख्याल से ये लफ्ज़ तुम लोगो के लिए नया है?

“नहीं।” साढ़े सात साल वाले बच्चे ने सर हिलाकर कहा।”असरा( जंगी कैदियों)के बारे में हमने उस वक्त जाना था जब आपने हमें जंगे बदर का वाकया सुनाया था।”

असल में मैंने उन्हें कैदियों के बारे उस वक्त बताया था जब मैं उन्हें हज़रत ख़ालिद‌ बिन वलीद रज़ीअल्लाहु अन्हु का वाक़या और उनके इस्लाम में दाखिल होने का सफ़र सुना रही थी। बच्चों को ये वाक़या बहुत ही पसन्द आया था।और उसके बाद से ही वे अक्सर मुझसे ये वाक़या सुनने की फ़रमाइश करते हैं।

हज़रत ख़ालिद के क़िस्से में सबसे अहम मोड़ तब आया जब उनके अपने भाई अल वलीद बिन वलीद ने इस्लाम क़ुबूल कर लिया। अलवलीद ने इस्लाम उस वक्त अपनाया जब वो कैदी बनकर मुसलमानों के बीच ग्रे,और उन्होंने डायरेक्ट (बराहे रास्त)बद्र की लड़ाई जीतने वाली मुस्लिम फौज की अपने दुश्मन क़ैदियो के साथ मेहरबानी( दयालुता) फ़राख़ दिली (उदारता)का तजरिबा किया। कुछ साल के बाद हज़रत ख़ालिद भी अपने भाई की पैरवी करते हुए उनकी तरह ही मुसलमान हो गये।

तो ये था वो संदर्भ ( सियाक़ या context) जिसमें बच्चों ने सबसे पहले जंगी क़ैदियो के बारे में सुना था।

“क्या अल्लाह के रसूल सल्लललाहु अलयहि वसल्लम भी कभी किसी जंग में क़ैदी बनाये गये हैं?” सबसे बड़े ने सवाल किया

“नहीं”.

“अच्छा तो क्या किसी जंग में उन्हें हार का भी सामना करना पड़ा है?” उसने अगला सवाल दाग़ा

“रसूलुल्ललाह सल्लललाहु अलयहि वसल्लम की ज़िन्दगी में उहद‌ की जंग ऐसी लड़ाई है जिसमें मुस्लिम फौज हार के क़रीब पहुंच गयी थीं। ये कुछ जटिल(पेचीदा) क़िस्म का मसला है। क्योंकि मुसलमान बड़े आराम से जीत रहे थे और बिल्कुल आखिर में कुछ लोगो की ग़लती की वजह से वो हारने लगे थे

मेरा इरादा था कि अभी इस किस्से को यहीं रोककर आगे बढ़ा जाये। और किसी दूसरे वक्त इस पर बात की जाये। लेकिन इसका क्या कीजिए कि इसके बाद फ़ौरन ही बच्चों के दिलचस्पी (उत्सुकता) से भरपूर सवालात शुरू हो गये।

“कैसे”.( मुसलमान हार की कगार पर कैसे पहुंचे)

इसका ताल्लुक (संबंध) जंग में फौज की तैनाती से है। पीछे की तरफ पहाड़ थे इसलिए अल्लाह के रसूल सल्लललाहु अलयहि वसल्लमने सामरिक रणनीति (फौजी हिकमते अमली)के तहत तीरंदाजों के एक ग्रुप को पहाड की ऊंचाई पर तैनात किया था।

हज़रत ख़ालिद( जो उस वक्त मुसलमान नहीं थे) बहुत ही समझदारी के साथ एक जगह रहकर मौके का इंतजार कर रहे थे, और बिल्कुल सही मौके पर वार करने की फिराक में थे। जब पहाड की चोटी पर तैनात मुसलमान तीरंदाजों की टुकड़ी ने वक्त से पहले अपनी पोजीशन छोड़ दी तो तो हज़रत ख़ालिद ने मौके का भरपूर फ़ायदा उठाते हुए पहाड़ के पीछे से हमला कर दिया,और जंग की बिसात पलट दी।

ये एक लम्बा और वक्त लेने वाला वाक़या था, लेकिन बच्चों को वाक़यात एवं घटनाये पसन्द होती हैं। वे पूरी तरह से मगन‌ थे। आगे झुककर आंखें फैलाकर दिलफरेब( मोहक) अंदाज से मुझे ताक रहे थे। ये सुनकर उनकी आंखें गोल हो गयी कि पहाड़ की चोटी पर तैनात तीरंदाजो में से जो अपनी जगह जमे रहे वो हज़रत ख़ालिद और उनकी फौज के हाथों शहीद हो गये। ऐसे ही जब बच्चों ने प्यारे नबी सल्लललाहु अलयहि वसल्लम के मुबारक चेहरे से खून बहने का वाक़या सुना तो उनकी आंखें फैल‌ गयी।

इसके बाद हमने इस वाक़ये से मिलने वाली कुछ सीख (असबाक़)के बारे बात की।

मसलन अल्लाह के रसूल सल्लललाहु अलयहि वसल्लम की ताबेदारी (आज्ञा पालन) की क्या अहमियत (महत्ता) है।उनकी नाफ़रमानी (अवज्ञा) के क्या विनाशपूर्ण (तबाहकुन) परिणाम (नतीजे) हो सकते हैं। इसके साथ साथ रोज़ाना की ज़िन्दगी में मां बाप की फ़रमांबरदारी की अहमियत क्या है। खुद पर काबू रखने और ख़्वाहिशात व इच्छाओं को हासिल करने का मौक़ा होने के बावजूद उनको दबाने के क्या फ़ायदे है।

मुझे मालूम है कि ये सब बातें,अख़लाक़ी क़दरे (नैतिक मूल्य)और आइडियाज ऊंचे दर्जे के है और बड़ी उम्र के लोग ही इनको सही से समझ सकते हैं,बच्चों की सतह( स्तर) से ये ऊपर की चीज़ें हैं। लेकिन आपको ये सुनकर हैरत भरी ख़ुशी होगी कि अलहम्दुलिल्लाह कि बच्चे काफ़ी हद तक समझने के काबिल हैं।और अगर उनको आसान करके उन्हीं की पसंदीदा ज़बान यानी क़िस्से और वाक़यात की शक्ल में ये सब सुनाया जाये तो वे बड़ी बड़ी मानी जाने वाली बातों को भी आराम से समझ लेते हैं।

मैं आजकल क़ुरान करीम के 30वें पारे को बेस बनाकर एक मुकम्मल विस्तृत एवं व्यापक ( जामेअ) कोर्स इस्लामी तरीके पर बच्चों की होम स्कूलिंग (घरेलू तालीम) के लिए तैयार कर रही हूं ( हालांकि बहुत ही सुस्त रफ्तार से ये चल रहा है) इसकी तशरीह (व्याखया) में मैंने तफ्सीर,अरबी शब्दकोश (vocabulary या ज़ख़ीरा-ए-अल्फ़ाज़) किरदार साज़ी (चरित्र निर्माण)इस्लामीइतिहास( तारीख़)सीरत,अख़लाक,नैतिकता,सोशल साइंस ( समाजी उलूम या सामाजिक विज्ञान) वगैरह को भी जोड़ा है। बेहतरीन‌ तालीम वहीं है जिसमें कई विषयो(मौज़ूआत) को एक जगह पढ़ाया जाये।

हमारी अक्सर क्लासों में यही होता है कि हम विभिन्न विषयों (मुख़तलिफ़ मौज़ूआत) एवं मुद्दों को उस क़ुरानी सूरत के साथ लगाकर पढ़ते हैं जो उस वक्त हमारे सबक़ या पाठ में चल रही होती है।

अल्लाह ताला हम मुसलमान मां बाप को इल्म और अक्ल अता फ़रमाए,और अल्लाह के दीन को पूरे ईमान‌ वह विश्वास के साथ अगली नस्ल तक पहुंचाने की तौफ़ीक अता फ़रमाए। आमीन

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