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क्या मुसलमान इमाम ग़ज़ाली और उस्मानी मुफ्तियों के फ़तवे की वजह से तरक़्क़ी नहीं कर सके ? वसी मियां ख़ान, मुहम्मद उमैर

एक मज़मून कुछ अरसे से वायरल हो रहा है जिसमें दो फ़तवो को मुसलमानो के पिछड़ेपन का कारण बताया गया है, एक तो इमाम ग़ज़ाली के बारे में कहा गया कि उन्होंने अपनी किताब “तहाफ़ुतुल फ़लास्फ़ा” में मैथमेटिकल केलकुलेशन को हराम करार दिया है,और दूसरा फ़तवा उस्मानी ख़िलाफत के मुफ़्तियो का बताया जा रहा है कि उन्होंने प्रिंटिंग प्रेस को नाजायज करार दिया, चूंकि इस तरह के लेख गलतफहमी पैदा करने में सहायक होते हैं, इसलिए इसका हल्का सा जायज़ा लेने की ज़रूरत महसूस करके मुहम्मद उमैर और वसी मियां ख़ान ने ये लेख तैयार किया है।

आजकल यही रिवाज है कि अपनी तमाम नाकामियों का ज़िम्मा उलमा पर डाल दो,अपने आप को नहीं बल्कि अपनी कौम को कोसो,हर दूसरा आदमी सोशल मीडिया पर यही करता दिखेगा,और फिर खुद अपनी पीठ थपथपायेगा,लेखक को यह भी नहीं पता के इमाम ग़ज़ाली की किताब *तहाफ़ुतुल फ़लास्फ़ा” कोई फ़तवे की किताब नहीं बल्कि अपने ज़माने के नास्तिकों के ख़िलाफ़ लिखी गयी एक किताब है जिसमें उन्होंने यूनानी फलसफ़ियों और अपने ज़माने के नास्तिकों के गलत नज़रियात का रद्द किया है। उसमें उन्होंने खुद लिखा है कि “वो मसाइल जो उसूले इस्लाम के ख़िलाफ़ नहीं, मिसाल के तौर पर ये मसला कि चाँद में इस वजह से ग्रहण लगता है कि उसके और सूरज के बीच में ज़मीन आड़ बन जाती है,इस किस्म के मसाइल का रद्द करना हमारा फ़र्ज़ नहीं है,जो लोग इन मसाइल के इंकार और रद्द करने को ही इस्लाम का हिस्सा समझते हैं वे हक़ीक़त में इस्लाम पर जुल्म करते हैं क्योंकि इन मसाइल को गणित (mathematics) और खगोल विज्ञान(Astronomy) साबित करते हैं जोकि शक की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते।”
(पृष्ठ-6)
इमाम ग़ज़ाली ने मैथमेटिकल केलकुलेशन को हराम करार नहीं दिया,बल्कि उस समय के यूनानी फ़लसफ़े( दर्शनशास्र)में से मेटाफ़िज़िक्स और थियोलोजी के पार्ट को मुसलमानो के लिए नाजायज करार दिया,और इस फ़िलासफ़ी को रद्द करना उस वक्त की अहम ज़रूरत थी,अगर इमाम ग़ज़ाली ने ये काम न किया होता तो शायद मुसलमानो पर यूनानी फिलासफी का रौब व दबदबा इतना बढ़ जाता कि फिर किसी के हटाये न हटता,उस वक्त मुसलमानो का हाल ये हो गया था कि यूनानी फिलासफी के पैराये और उसके विशेष स्वरूप से अलग कोई बात रखी जाती तो उसको कबूल नहीं किया जाता था ।
इसलिए क़ुरान व हदीस की अज़मत व महानता का सिक्का बैठाने और उनके सही महत्व की तरफ ध्यानाकर्षण करने हेतु इमाम ग़ज़ाली को यूनानी दर्शनशास्र का गहरा अध्ययन करना पडा, जिसके बाद उनके सामने इसकी कमज़ोरी ज़ाहिर हुई,और उन्होंने दुनिया के सामने इसकी बखिया उधेडकर रख दी।

लेकिन उन्होंने इस फिलासफी को पूर्ण रूप से रद्द नहीं किया, बल्कि इसके बेहतर और लाभदायक हिस्से को सही माना,और इसको छ:भागो में तक़्सीम करके इसके “मेटाफ़िज़िक्स” और “थियोलोजी” वाले भाग को मुसलमानो के लिए हानिकारक बताया।
उन्होंने खुद लिखा है कि इस किताब में हमें गणित को रद्द करने की ज़रूरत ही नहीं है क्योंकि गणित के दो भाग हैं, अंकगणित और रेखागणित और दोनों का ही फलसफे के गलत मसाइल को रद्द करने से कोई लेना देना नहीं है।
(पृष्ठ-12)

दूसरी बात ये है कि ग़ज़ाली का जितना असर मुसलमानो पर पड़ा उससे कम प्रभाव यूरोप पर भी नहीं पडा, हैरत है कि ग़ज़ाली के नक्शे-कदम पर चलने वाले “डेकार्ट”, “ह्यूम” और “व्हाइटड” जैसे यूरोपियन फ़िलास्फ़र,दार्शनिक एवं बुद्धिजीवी तो एक नये दौर का आगाज करने वाले और आधुनिक यूरोप के सर्वेसर्वा माने गये,और ग़ज़ाली तरक्की को रोकने वाले और पीछे की तरफ ले जाने वाले समझे गये ?

दिलचस्प बात ये है कि डेकार्ट तो यूरोप में फिक्र व फिलासफी के पुनरूत्थान का बाप माना जाता है जिसने हर चीज में शक के उसूल को अपनाते हुए साइंस की तरक्की के लिए बुनियादी उसूल पेश किया,गौर करने वाली बात ये है कि शक का नजरिया( scepticism स्केपटिसिज़्म) सबसे पहले ग़ज़ाली से ही मशहूर हुआ,जबकि ह्यूम ने ग़ज़ाली को फ़ालो करते हुए चीजों के दरम्यान “कोज़ एंड इफ़ैक्ट”( सबब व मुसब्बब के बीच रब्त)के बीच ज़रूरत के नज़रिए का इंकार किया।

ऐसे ही “व्हाइटड”जिसने “ब्रट्रेंड रसेल” के साथ मिलकर फ़िलास्फ़ी आफ़ मैथमेटिक्स की काया पलट दी उसकी अक्सर फ़िलासफ़ी ग़ज़ाली से “मैच”करती है।

फिर ग़ज़ाली के देहान्त के सिर्फ 15 साल बाद मुसलमानो में “इब्ने रूश्द” ( एवररूस Averroes)
जैसा अज़ीम फ़िलास्फ़र और बुद्धिजीवी पैदा हुआ, जिसने ग़ज़ाली की किताब “तहाफ़ुतुल फ़लास्फ़ा” के जवाब में “तहाफ़ुतुत् तहाफ़ुत” लिखी।

अगर ये मान भी लिया जाये कि मुसलमानो पर ग़ज़ाली की किसी बात का नकारात्मक प्रभाव पड़ा भी हो तो स्पेन में इब्ने रूश्द के उरूज के बाद उसको खत्म नहीं तो काफ़ी हद तक कम हो जाना चाहिए था।

बहरहाल पिछली कई सदियों से मुसलमानो की बड़ी तादाद न तो ग़ज़ाली से वाकिफ हैं न ही उनकी किताब तहाफ़ुत से, अगर किसी ने ग़ज़ाली का नाम सुना भी है तो तहाफ़ुत तो उसके सपने में भी नहीं आयी,लिहाजा अपनी बदअमली का दोष इमाम ग़ज़ाली को देना बेवकूफी के साथ साथ ज़ुल्म भी है।

रही उस्मानी खिलाफ़त के मुफ़्तियो की बात तो अव्वल तो प्रिंटिंग प्रेस के खिलाफ फ़तवा देने वाली बात ही गलत और निराधार है,दूसरे अगर उसे ठीक भी मान लिया जाए तो खुद लेखक ही के अनुसार इमाम ग़ज़ाली से पहले मुस्लिम दुनिया गणित और विज्ञान में बड़ी तेजी से तरक़्क़ी करती जा रही थी,अगर प्रिंटिंग प्रेस ही इल्म की तरक़्क़ी की वजह थी तो उस समय इस्लामी दुनिया को इतनी तीव्र गति से तरक़्क़ी नहीं करनी चाहिए थी। जबकि सब मानते हैं कि आज का जो कुछ विज्ञान हमारे पास है उसकी बुनियाद में मुसलमानों का बहुत बड़ा योगदान है।
फिर इस फ़तवे से ज़्यादा से ज़्यादा उस वक्त के उलमा व मुफ़्तियो की एहतियात और दीन से ताल्लुक़ ही की झलक मिलती है कि वे अपने दुश्मन की तरफ से आने वाली किसी चीज को तहक़ीक़ के बगैर क़बूल करने पर आमादा नहीं थे,और जब तक हक़ीक़त पता न चले तब तक उसको जायज़ कैसे कह सकते थे ?

आज इतने अर्से बाद कहना बड़ा आसान है, लेकिन प्रेस की ईजाद के समय हालात क्या रहे होंगे और उसको कैसे लिया गया होगा ये इस वक्त तक सही तौर पर नहीं समझा जा सकता जब तक कि उस जमाने के माहौल, ईसाईयों और मुस्लिमों के ताल्लुकात के साथ साथ मुफ़्ती के पद की महत्ता और नज़ाकत को न समझ लिया जाये,और साथ ही उन मुफ्तियों के दलाइल भी देखें जाये जो प्रेस को नाजायज मानते थे।

फिर ऐतिहासिक तथ्य ये है कि उस्मानिया सल्तनत के इस्तांबुल में प्रिंटिंग प्रेस उसी वक़्त आ गया था जिस वक्त यूरोप में आया,यानी 15वीं सदी में,हाँ यह बात अलग है कि उसको चलाने वाले यहूदी,अर्मेनियाई एवं यूनानी मूल के लोग थे। लेकिन चूंकि वो सल्तनत के अंदर ही मौजूद था और उनकी ये कोशिश सल्तनत की छत्रछाया में ही फल-फूल रही थी तो इसका श्रेय सल्तनत को ही जायेगा,जैसे आज यूरोप, अमेरिका और एशिया में किसी भी वैज्ञानिक का कारनामा उसके देश को ही समर्पित होता है,और फिर खुद मुसलमान भी उसको देख कर अपना प्रिंटिंग प्रेस कायम कर सकते थे, ये कोई बड़ी बात नहीं थी, खास तौर पर उस समय जब आपके पास इतनी बड़ी सल्तनत भी हो।

तथापि उस वक़्त मशीनों के आविष्कार में मुसलमान किसी से ऐसे पीछे भी नहीं थे,जैसा लेखक जताना चाहते हैं,अगर सलीबियों के पास तोपें थी तो मुसलमानों के पास भी थी,तो आखिर प्रिंटिंग प्रेस ही कौन सा ऐसा तिलिस्मी डब्बा था जो यहूदियों और यूनानियों के अलावा कोई नहीं खोल सकता था। हक़ीक़त में बात यह थी कि जहां मुसलमान इल्म में ज़बरदस्त तरक़्क़ी कर रहा था वहीं उसके पास लिखने वाले माहिर किस्म के कातिब भी एक से बढ़ कर एक बड़ी तादाद में मौजूद थे,सुलेखन और हस्तलिपि को मुसलमानों ने अपने दौर में किस ऊंचाइयों पर पहुंचाया था यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। उन खूबसूरत और बेहतरीन अंदाज़ में सजा कर लिखी गयी किताबों के मुकाबले में प्रिंटिंग प्रेस से छपी हुई भद्दी किताबें मुसलमानों को भला कहाँ रास आने वाली थी, जबकि मुसलमानों में एक बड़ी तादाद ऐसे लिखने वालों की थी जो बहुत तीव्र गति से सुलेखन के साथ किताब की नक़ल तैयार कर दे। इसके साथ ही वो बहस जो आज के मशीनों से भरपूर दौर में भी खूब जगह लेती है लेकिन आज की ज़ालिम और पूंजीवादी दुनिया उसपर ज़रा भी कान नहीं धरती है वो है कामगारों और हाथ के कारीगरों के अधिकार,जिन पर हर मशीन के आ जाने के बाद बड़ा असर पड़ता है,लाखों लोगों की नौकरियां चली जाती हैं, लोग भूख से मर जाते हैं कि उनका रोज़गार मशीन खा गई, उस्मानिया दौर में भी ये विचार ज़ोरों पर था,और तथ्य ये है कि मुसलमानों से ज़्यादा इंसान हमदर्द कोई नहीं होता,इसलिए उसको आज के पूंजीवादियों की तरह बिल्कुल नज़रअंदाज़ नहीं किया गया।

ज़माने के गुजरने के साथ साथ जब मुसलमानों में हस्तलिपि के फन को जानने वालों की तादाद कम होती गई और उधर यूरोपीय दुनिया में प्रिंटिंग प्रेस से छप कर आने वाली किताबों से कुछ आंखों का परिचय सा हो गया तो उस्मानियों ने भी 1727 में अपने यहां एक प्रिंटिंग प्रेस कायम कर ली, आजकल जो बड़े विकसित देश समझे जाते हैं उनमें अमरिका के न्यू यॉर्क में भी प्रिंटिंग प्रेस उस्मानियों से सिर्फ 36 साल पहले आया।

वैसे ये सब बाते बल्कि इससे कहीं ज़्यादा ईसाईयत और यूरोप पर फिट होती है, पोप और चर्च ने साइंटिस्ट्स और उलमा का हाल क्या कर रखा था ये छुपा नहीं है,साइंस के बावा आदम “गैलिलियो”और माडर्न मैथमेटिक्स के बाबा”कोपरनिकस” के अंजाम से तो सभी वाकिफ हैं,इमाम ग़ज़ाली ने तो अगर मान भी लिया जाये सिर्फ फतवा दिया था वो भी प्रिंटिंग प्रेस से पहले,लेकिन यहां तो साइंनसादानों की पूरी खेप को मृत्युदंड दे दिया गया, जुर्म सिर्फ साइंस में मशगूल होना था।

अब सिर्फ ये सवाल यह जाता है कि यूरोप ने चर्च के ज़ुल्मो के बाद भी साइंस में तरक्की कर ली,लेकिन मुसलमान सिर्फ फ़तवे को लेकर बैठ गये,दरअसल लिखने वाला मैसेज यही देना चाहता है कि मुसलमान दीन को पकड़कर पिछड़ गए, ईसाईयों ने दीन की “जकड़नों” और कैदो को तोड डाला तो तरक्की के एवरेस्ट पर पहुंच गए, इससे ये सन्देश साफ मिलता है कि मज़हब कोई भी हो वो “इल्म” व “तरक़्क़ी” की राह में रुकावट है।

ये समझने वाला असल में इस्लाम और ईसाइयत या दूसरे मज़हबो को सरसरी सी नजर से एक ही खाने में रखकर अपने दिमाग में पहले से तय “तरक़्क़ी के मेअयार” पर उन्हें तौलता है,हालांकि इस्लाम और दूसरे मज़हबो के हर चीज को देखने समझने और कबूल करने के नज़रिए और फिक्र में ज़मीन आसमान का फर्क है। उसको समझाने का ये वक्त नहीं है बस एक हल्का सा इशारा काफी है ।
क़ुरान करीम में एक आयत हैं सूरा आल इमरान सूरा नम्बर 2 आयत नम्बर 185
كُلُّ نَفۡسٍ ذَآئِقَةُ الۡمَوۡتِ‌ؕ وَاِنَّمَا تُوَفَّوۡنَ اُجُوۡرَكُمۡ يَوۡمَ الۡقِيٰمَةِ‌ؕ فَمَنۡ زُحۡزِحَ عَنِ النَّارِ وَاُدۡخِلَ الۡجَـنَّةَ فَقَدۡ فَازَ ‌ؕ وَمَا الۡحَيٰوةُ الدُّنۡيَاۤ اِلَّا مَتَاعُ الۡغُرُوۡرِ‏ ۞

अनुवाद : हर शख्स को मरना है,और तुम सबको तुम्हारा पूरा बदला क़यामत के दिन मिलेगा,तो जो वहां दोज़ख़ की आग से बचकर जन्नत में दाखिल हो गया वही कामयाब है, दुनिया की ज़िन्दगी तो सिर्फ एक फ़रेब का सामान है।

तो इस्लाम के नजदीक “कामयाबी”एवं “तरक्की” का मेअयार असल में ये है,जो इस पर पूरा उतर गया वह चाहे दुनिया की हर तरक्की में पिछड़ जाये वह फिर भी आइंस्टाइन और न्यूटन से ज़्यादा कामयाब है।

लेकिन इसका मतलब हरगिज़ ये नहीं है कि दुनिया के किसी इल्म को हासिल करना और अल्लाह की कायनात में गौर करना मना है, बल्कि इस्लाम तो जायज हदों मे इसकी हौसला अफजाई करता है,इसी आयत के चार आयत बाद ये आयत भी है :

اِنَّ فِىۡ خَلۡقِ السَّمٰوٰتِ وَالۡاَرۡضِ وَاخۡتِلَافِ الَّيۡلِ وَالنَّهَارِ لَاٰيٰتٍ لِّاُولِى الۡاَلۡبَابِ ۞ الَّذِيۡنَ يَذۡكُرُوۡنَ اللّٰهَ قِيَامًا وَّقُعُوۡدًا وَّعَلٰى جُنُوۡبِهِمۡ وَيَتَفَكَّرُوۡنَ فِىۡ خَلۡقِ السَّمٰوٰتِ وَالۡاَرۡضِ‌ۚ رَبَّنَا مَا خَلَقۡتَ هٰذَا بَاطِلًا ۚ سُبۡحٰنَكَ فَقِنَا عَذَابَ النَّارِ

अनुवाद : ज़मीन‌ वो आसमान के पैदा करने और रात दिन के बारी बारी आने जाने में अक़्लमनदो के लिए निशानियां है,जो उठते,बैठते लेटते हर हाल में खुदा को याद करते रहते है,और आसमानों व ज़मीन की बनावट में ग़ौर करते रहते हैं,(और ये सब देखकर बेइख़्तियार कह उठते हैं) ऐ हमारे पालने वाले! ये सब कुछ तूने फ़ुज़ूल और बेमक़सद पैदा नहीं। किया,तू (बेमतलब कामों के करने से) पाक है,बस हमें जहन्नम के अज़ाब से बचा ले।

देखिए यहां गौर फिक्र करने को अक्लमंदों का काम बताया गया है, और ग़ज़ाली शैख़ुल इस्लाम होकर इसको मना नहीं कर सकते थे।

और फिर इस बात में वाकई कितनी हकीकत है कि मुसलमानो ने साइंस की तरक्की में कोई योगदान न दिया, बल्कि। बिल्कुल पीछे हट गये? या ये सब सोची समझी रणनीति के तहत मशहूर किया गया ? इस पर तो एक मुकम्मल मज़मून की जरूरत है, बस इतना बता देना काफी है कि बीसवीं सदी के अन्दर अहम प्रोजेक्ट्स एवं आविष्कारों पर काम कर चुके या कर रहे 20 से ज़्यादा मुस्लिम साइंसदानों को कत्ल कर दिया गया, जिनके कारनामों का क्रेडिट किसी अंग्रेजी नाम वाले व्यक्ति को दे दिया गया ।

इन दो मिसालों के पेश करने से लेखक का मक़सद पश्चिम से हद दर्जा प्रभावित होना है जैसा कि ऊपर लिखा गया है। लेखक पश्चिमी दुनिया का बहुत रौब दिल में लिए हुए है,और चाहता है कि वही रौब वो मुसलमानों के दिल में बिठा दे,इसी लिए साइंस के उन शब्दों को जिन्हें वो खुद नहीं जानता है रौब मारने के लिए गलत इस्तेमाल कर रहा है, जैसे उसने लिखा Gravitational force waves, जबकि gravitational force और gravitational waves अलग अलग इस्तेमाल होता है, लेखक ने रौब मारने के लिए दोनों का मिश्रण कर दिया है। इसी तरह cosmology की infinity कोई चीज़ नहीं होती।

इनाम का मिल जाना योगदान देने या न देने का पैमाना नहीं है, बीस से ज़्यादा अतीत के समुद्र में गुम कर दिए गए मुस्लिम आविष्कारकों और साइंसदानों का ज़िक्र ऊपर किया गया है।

जिस हवाई जहाज़ का यह ज़िक्र कर रहे हैं, इन्हें मालूम होना चाहिए कि अब्बास इब्न फिरनास ने सब से पहले, नवीं सदी में दुनिया को बताया कि आसमान में परिंदों की तरह उड़ पाना संभव है,और इतिहास में सबसे पहली कामयाब उड़ान उन्हीं की दर्ज है, उन्हीं से बाद में जॉर्ज केले और वाइट ब्रोथर्स ने प्रेरणा ली।

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