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सोना मर्दों पर हराम क्यूं है ? (मनुष्य की उत्पत्ति एवं जीवन ध्येय की रोशनी में मसले का आम जायज़ा)वसी मियां ख़ान राज़ी

 

 

 

मनुष्य की उत्पत्ति एवं जीवन ध्येय की रोशनी में मसले का आम जायज़ा

कुछ दिन पहले एक मित्र ने प्रश्न किया कि इस्लाम मे मर्दों के लिए सोना पहनना हराम क्यूं है, इसका क्या कारण है? मैंने उस समय संक्षिप्त( मुख़्तसर) उत्तर दे दिया जो अलहम्दुलिल्लाह उनके लिए काफी हो गया,

क्योंकि वह एक दीनदार आदमी थे परन्तु मेरे दिमाग में ये ख़्याल आया कि इस तरह बहुत से मसले हैं जहां दीन से दूर मुस्लिम नौजवानों एवं दूसरे गैर मुस्लिम भाइयों की ओर से भी इस्लाम के मार्गदर्शन,इसके कानून को लेकर असहमति और कभी कभी आपत्ति के स्वर यदा यदा उठते रहते हैं, इसलिए बेहतर है कि इस सोच के आधार और मूल पर एक निगाह डाल ली जाये, ये विचार कैसे उत्पन्न होते है ।

इसकी तरीका यही समझ मे आया कि पहले संक्षेप में मनुष्य की रचना,उसकी उत्पत्ति एवं पृथ्वी पर उसके जीवन का ध्येय जानने की कोशिश की जाये, उसकी समस्त प्रजातियों से भिन्नता के कारणो को उजागर करने का प्रयत्न किया जाये, फिर इसकी रोशनी में आधारभूत मनोवृत्ति का जायजा लेकर उसके हल की तरफ बढा जाये।

मनुष्य की सांसारिक वस्तुओं पर निर्भरता:

मनुष्य अपनी शारीरिक संरचना,( जिस्मानी साख़्त)अपनी अद्भुत( हैरतअंगेज) मानसिक कौशलता( ज़हनी काबिलियत) एवं जीवन प्रकिया ( तरीके हयात) में समस्त प्राणियों से भिन्न है,यही भिन्नता उसको दूसरी प्रजातियों,जीव जंतुओं से बेहतर बनाती है,परन्तु यही फ़र्क इस बात का भी द्योतक( ग़म्माज़) है कि मनुष्य एक आम जीव के मानिंद खान- पान कपडा रोटी,आवास निवास एवं विलासिता से इतर किसी अधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य ( अहम मकसद)की प्राप्ति ‌हेतु इस‌ धरती पर आया है,

क्योंकि हम देखते हैं कि इस संसार की हर चीज किसी न किसी तरह मनुष्य के ही काम मे लगी हुई है,सूरज, चांद,जल,वायु, मेघ,( बादल)जानवर, जीव-जंतु फल फूल इनमे से कौन ऐसा‌ है जिसके बगैर मनुष्य एक पल भी रह‌ सके, वह इन सब पर निर्भर है,किन्तु इनमें से कुछ भी‌ तो मनुष्य के ऊपर निर्भर नही करता, बल्कि इन्सान से इनको हमेशा खतरा ही लगा रहता है।

दूसरी तरफ मनुष्य अपनी बुद्धि के बल पर शक्तिशाली प्राणियों,दरियाओं,पहाडो,और आकाश मे चमकते सितारो तक को भेद रहा है, दुनिया की कोई ताकत, संसाधन उसको इस इस्तेमाल से रोकने की पोजिशन में नहीं है, पानी और हवा अगर चाहे भी तो मनुष्य के हाथो होते अपने शोषण ( इस्तिहसाल) पर कोई पाबंदी नहीं लगा सकते।

इरादे एंव अधिकार की विशेषता:

मनुष्य और दूसरी वस्तुओं मे एक बडा अंतर इरादे का है , मनुष्य अपनी मरजी से चीजो को चुन सकता है,उन्हें रद्द कर सकता है,कई विकल्पों में से एक की तरफ झुक सकता है,अपनी स्वाभाविक इच्छाओं ( फ़ितरी ख़्वाहिशात) को दबाकर अपने मन के खिलाफ फैसले कर सकता है।(रमज़ान‌ का रोज़ा इन्सान की इसी प्रकृति( फ़ितरत)को उभारकर उसे उसके मुख्य लक्ष्य( असल मक़सद) की याद दिलाता है)

भविष्य का बोध ( मुस्तकबिल का शऊर) :

मनुष्य और जानवर मे एक बडा अंतर ये है कि मनुष्य अपने वर्तमान के साथ साथ भविष्य के लिए भी चिंतित रहता है,बल्कि देखा यही गया है कि वह बेहतर भविष्य के लिए वर्तमान के ऐश‌ व आराम की भी उपेक्षा कर देता है,मनुष्य ही ऐसा जीव है जो दीर्घावधि योजनाएं ( लांग टर्म प्लान) बनाता है। ( इस दुनिया के बाद दूसरी दुनिया की धारणा इसी सिद्धांत पर आधारित है)

परन्तु इतनी शक्तियों के बावजूद इन्सान संसार भर बल्कि शायद पूरे ब्रह्मांड में अकेला ऐसा जीव है जिसके अस्तित्व (वजूद )से उसके अलावा किसी भी चीज को कोई फायदा नहीं है , अगर आप गौर करें तो पता चलेगा कि मनुष्य हर चीज का उपयोग बल्कि उपभोग करता है लेकिन कोई भी जीव जंतु , या वस्तु मनुष्य से कोई फायदा नहीं उठा पाती , इसका सीधा सा मतलब यही है कि मनुष्य किसी बडे लक्ष्य क प्राप्ति हेतु जी रहा है,ऐसा लक्ष्य कि जिसमे वह अपने चाल-चलन और तमाय कार्यो के प्रति जवाबदेह हो,

क्योंकि वह अकेला जीव है जिसको विकल्पों में चुनाव की शक्ति दी गयी है,कि चाहे तो किसी काम को करे या न करे,जब मन करे खाये पिये,जब मन करे न खाये, अपनी प्राकृतिक इच्छाओं को काम मे लाये या उन्हें दबा ले, जब मर्जी हो कानून का अनादर करे, जब चाहे पालन करे,
यहां तक कि अपनी प्रकृति के विपरीत अप्राकृतिक तरीकों से अपनी इच्छाओं की तृप्ति करे,जानवरों या दूसरी निर्जीव वस्तुओं मे ये ताकत नहीं कि अपनी प्राकृतिक संरचना एवं स्वभाव के विपरीत कुछ कर सके, इससे पता चलता है कि मनुष्य अपने बनाने वाले के ही किसी काम को पूरा करने इस दुनिया में आया है,और वह काम किस तरह हो सकता है इसके लिए उसके मालिक ने कुछ संदेशवाहक दूत (रसूल) एवं पैगम्बर भेजे, जिनमें आख़िरी पैगम्बर मुहम्मद सल्लललाहु अलयहि वसल्लम है।

धर्म की दिशा निर्देश का प्रमुख उद्देश्य:

पैगम्बर जिस खुदाई कानून को लोगों के सामने पेश करता है,कि इसमे तुम्हारे बनाने वाले की इच्छा और खुशी है, और उसके आदेश और व्यवस्था का वर्णन है, उसको दीन, मजहब, धर्म कहा जाता है, इस मजहबी संविधान मे सबसे अधिक ध्यान नैतिकता,सदाचार, कृतव्यपरायणता, आचार विचार के सुधार और मनुष्य के सामाजिक एवं घरेलू आचरण व संबंधो पर केंद्रित होता है, क्योंकि इन चीजों का संतोषजनक हल मानव इतिहास मे कभी भी इन्सान को नही मिल पाया, इसकी वजह बडी सीधी सी है,

मनुष्य अपने सीमित ज्ञान के बल पर किसी भी घटना/ मसले के सभी पहलुओं एंव पक्षो को नहीं जान पाता,वो अपनी सीमित दृष्टि एवं कल्पना की सहायता से कुछ ही पहलुओं तक पहुंच पाता है, यही कारण है कि आज तक वह अपने से संबंधित अधिकांश मामलों में मुंह की खाता रहा है, हर दौर की संस्कृति, सभ्यता ( तहज़ीब व सक़ाफ़त)ने मानव स्वभाव( इन्सानी मिज़ाज) के अनुरूप एक सुदृढ़ एवं ठोस सामाजिक,न्यायिक एवं नैतिक व्यवस्था को लागू करने के भरसक प्रयास किये, लेकिन गुजरते समय ने उसकी कमियों को उजागर कर दिया।

हां ये बात सही है कि इन्सान ने अपने उपयोग के लिए भौतिक (माद्दी)व सांसारिक वस्तुओं पर जो प्रयोग किये उसमे उसे काफी हद तक सफ़लता मिली, हालांकि इस तरक्की के नकारात्मक परिणामों को भी उसे भुगतना पडा, लेकिन फिर भी कुछ न कुछ कामयाबी उसे मिलती गयी, जबकि विशुद्ध ( ख़ालिस) मानवीय मुद्दों पर उसकी उपलब्धियां नगण्य ( कल अदम) है।

इसका कारण ये है कि मनुष्य अपने द्वारा निर्मित वस्तुओं से भली भांति परिचित होता है, उसे उसके नियमों का अच्छा ज्ञान होता है, लेकिन मनुष्य की सबसे बड़ी गलती ये है कि भौतिक संसार के एक सूक्ष्म से हिस्से पर अपनी विजयी पताका फहराने के बाद उसे ये भ्रम हो गया कि वह अपने अध्यात्मिक पथ प्रदर्शन ( रुहानी रहनुमाई spiritual guidance)के लिए भी अब किसी बाहरी शक्ति पर आश्रित नही है,

वह अपने ” असीम” एवं ” अपरम्पार” ज्ञान की बदौलत मानव संबंधों, वैचारिक मूल्यों, नैतिक शिक्षाओं की राह भी स्वंय ही तय कर सकता है, इसी अहंकार ने उसे नास्तिकता,अनिश्वरवाद की तरफ धकेल दिया, अब वह अपनी तबाही के परवाने पर स्वयं ही हस्ताक्षर कर रहा है।

इस दौर के मनुष्य ने जीवन के हर विभाग मे विज्ञान के बढते प्रभाव से प्रेरित होकर हर चीज को भौतिकता के चश्मे से देखना आरम्भ कर दिया, लाभ- हानि का मापदंड ( मेअयार) भौतिकवाद मे सिमट कर रह गया, अगर किसी कार्य का प्रभाव प्रकट रुप मे दो और दो चार की तरह अगर न दिखाया जाये तो उसकी अक्ल उसे मानने के लिये तैयार नही है,

हालांकि मानव ज्ञान विशेष रूप से अपने व्यक्तिव के बारे में अभी भी अपने प्रारंभिक चरण से ही गुजर रहा है, जो कुछ जान गया है वह उससे बहुत कम है जो नही जानता है, इसी मिथ्याबोध ( ग़लतफ़हमी) के चलते बहुत से मामलों में इन्सान भ्रांति का शिकार हुआ है,वह हर चीज को अपने बनाये मापदंडों से परखना चाहता है, उदाहरणतः धर्मनिरपेक्षता का मसला है, इस दौर मे इसका अर्थ ये हो गया है कि अगर आप दूसरे धर्म की मान्यताओं,आस्थाओं को मानते है,

उनके त्योहारों को मनाते हैं, उनकी उपासना के तरीकों को सही मानते हैं तो आप धर्मनिरपेक्ष हैं, फिर चाहे आपकी पूरी ज़िन्दगी साम्प्रदायिकता का झण्डा उठाने मे ही क्यों न‌ गुजरी हो, हालांकि धर्मनिरपेक्षता महज इतना चाहती है कि आप दूसरे धर्मों का सम्मान करें, उनको अपमानित न करे, उनकी पूजा पाठ में विघ्न‌ न डालें।

अगर धर्मनिरपेक्षता का मतलब सभी धर्मों को मानना, उनके पूजा के तरीको को अपनाना, उनके त्योहारों को मनाना है तो ये एक मज़ाक़ तो हो सकता है, धर्म जैसी महत्वपूर्ण एवं गंभीर चीज के साथ कोई विवेकपूर्ण रवैया हरगिज नहीं, जब सभी धर्मों के तरीकों पर अमल करना है तो आखिर फिर इनमे फर्क क्या रह जायेगा ??

वैसे भिन्न धर्मो के मानने वालो मे ज़्यादा अम्न और ताल्लुक उस समय था जबकि आजकल की तरह धर्मनिरपेक्षता के प्रचार का ढकोसला नहीं था, लोग अपने धर्म पर अमल करते हुए, दूसरे की आजादी का ख्याल रखते थे, इसके लिए दूसरे धर्म के तरीकों को अपनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।

असल मे ये एक भौतिकतावादी सोच है, कि मनुष्य ईश्वर की वाणी,उसके भेजे गये धर्म को भी सतही तरीके से डील करे, विशेष तौर पर इस्लाम अपने मानने वालो को एक खास तरीके से अपने दामन मे जगह देता है कि इन्सान अल्लाह के एक होने, मुहम्मद सल्लललाहु अलयहि वसल्लम के उसका आखिरी पैगम्बर होने और क़यामत मे दोबारा ज़िंदा किये जाने पर ईमान‌ रखे, अब ये ईमान‌ जिस तरह जिस्म मे दाख़िल होता नज़र नही आता ऐसे ही, सिर्फ चंद शब्दो के जाहिरी इक़रार से मान‌ लिया जाता है,

ऐसे ही ये चन्द विशेष कार्यो, हरकतो, बातो से चला भी जाता है, अब इसके लिए ये हाय तौबा मचाने की आवश्यकता नहीं है कि इतनी सी बात से इसलाम से ख़ारिज कैसे हो सकता है , ये सब जाहिल मुल्ला, मौलवियों के फ़तवे है जिन्होने दीन‌को तंग कर दिया है, वरना दीन तो बहुत ही आसान है।

इसी तरह जीवन के दूसरे मामलों में जब ईशवर का कोई हुक्म हमे मिलता है तो हमारा सीमित ज्ञान‌ उसकी सही अनुभूति नही कर पाता, कि इसके पीछे क्या तर्क है, विशेष रूप से ऐसी जगह जहां हमारे पास सही सूचना का कोई साधन ईशवरीय वाणी के सिवा नही होता,

तो अगर हम ईश्वर मे विश्वास एंव आस्था रखते हैं, उसको सबसे बड़ा ज्ञानी सर्व शक्तिमान मानते है, अपना पालनहार जानते है तो फिर अपनी बुद्धिमत्ता को लगाम देकर अपनी अज्ञानता का इकरार करते हुए उसके आदेश पर शीश‌ नवा देना चाहिए।

सोने के नाजायज होने का मसला:

इस्लाम में सोने के मर्दों पर हराम होने का मसला भी कुछ इसी तरह का है, इसकी दलील के लिए इतना ही काफी है कि अल्लाह के आख़िरी पैगम्बर मुहम्मद सल्लललाहु अलयहि वसल्लम ने खुदा के हुक्म से इसको मर्दों के लिए हराम एवं महिलाओं के पहनने के लिए आभूषण के तौर पर जायज करार दिया है,

अब जाहिर है कि इसके पीछे मजबूत तर्क अवशय है, लेकिन आम मनुष्य के लिए उनका जानना आसान नहीं, इतना विश्वास काफी है कि किसी लाभ की चीज को हराम नहीं किया गया है , लेकिन ज़्यादा इत्मीनान के लिये कुछ बाते लिखी जाती है।

1) सोना पहनने की जरूरत जीनत और सिंगार के लिए है , जिसकी ज़रुरत औरत को है मर्द को नहीं , क्योकि सोने का कोई और फ़ायदा ज़ेवर होने के अलावा नहीं है , और मर्द को ज़ेवर की जरूरत नहीं ।

वजह इसकी है ये कि अल्लाह तआला ने मर्द और औरत को पैदा करके दुनिया के निजाम को चलाने के लिए उनमे एक दूसरे के लिए कशिश रखी है , औरत ( बीवी) को शौहर की तवज्जो के लिए आराइश , ज़ीनत , बनाव सिंगार की जरूरत है , मर्द को ऐसी जरूरत नहीं ।

2) मर्दों के लिए औरतो की नकल करना , उनके लिबास और तरीके को इख्तियार करने से मना किया गया है , ऐसे ही औरतों को मर्दों की नकल से मना किया गया है , क्योंकि दोनों की जिम्मेदारी अलग अलग है तो काबलियत भी अलग अलग ही चाहिए , और सोना जेवर होने की वजह से औरत की खासियत है , मर्द के लिए जायज न होगा ।

3) सोना दरअसल करंसी है,( कागजी नोट असल मे करंसी नहीं है , इनकी अपनी कोई मार्केट वेल्यू नहीं होती )और इसकी तखलीक का असल मकसद भी यही लगता है , अगर मर्द सोना पहनने लगे तो मार्केट मे करंसी का फ़्लो रुक जायेगा, ये ऐसा ही है जैसे कोई शख्स करंसी नैट पहनने लगे। इसका तकाजा ये था कि औरत के लिए भी सोना हराम होता ,

लेकिन सोने को चूंकि जीनत का एक बड़ा जरिया शुरू से ही समझा जाता रहा है, और औरत अपनी तखलीक,अपनी फितरत के लिहाज से बनाव सिंगार की आदी रही है , क़ुरान ने सूरे ज़ुख़रुफ़ मे औरत की इस फितरत का जिक्र किया है ” ” क्या जो ज़ेवरो मे पाली जाती है और बहस मे अपनी बात पूरी तरह क्लियर नही कर सकती ” ( सूरा :42 आयत 19) इसलिए औरत के लिए सोना सिर्फ पहनने की हद तक हलाल किया गया, सोने के बरतन और दूसरी चीजें मर्द और औरत दोनों के लिए हराम है ।

फिर औरत के सोने के ज़ेवरो मे ज़कात भी रख दी , ताकि औरते बहुत ज़्यादा सोना इस्तेमाल करके बाजार को फ़्रीज न कर दे,ज़कात लाज़िम होने पर इन ज़ेवरो का कुछ न कुछ हिस्सा उन आम लोगो तक भी पहुचता रहेगा जो सीधे तौर पर इससे फ़ायदा नही उठा सकते ।

4) नई रिसर्चेस से पता चला है कि सोना पहनने वाले मर्दों को अल्ज़ाइमर की बीमारी का ख़तरा औरतो के मुकाबले बहुत ज़्यादा है,यही नहीं इससे याददाश्त और दिमागी कुव्वत पर असर पड़ता है इंग्लैंड के मशहूर अखबार डेली मेल मे छपी रिपोर्ट के अल्फ़ाज़ देखिए : Men may be at higher risk of developing mild memory loss that can lead to  Alzheimer’s than women, say researchers.

A new study shows men had up to twice the risk of losing memory and other brain skills such as planning and carrying out complex tasks in later life.
पूरी खबर पढ़ने के लिए लिंक https://www.google.com/amp/s/www.dailymail.co.uk/health/article-2091928/amp/Men-greater-risk-mild-memory-loss-lead

एक स्टडी मे ये पाया गया है कि मर्द के अन्दर मर्दाना होरमोन 80% होते है और ज़नाना होरमोन का रेशो 20% है, सोना मर्दाना होरमोन को नुक्सान पहुंचाता है ।

इसी तरह की बहुत सी रिसर्च है,हालांकि कुछ लोग इनका इन्कार भी करते हैं,लेकिन आजकल इस तरह की रिसर्च और तहकीकात मे भी काफी घालमेल और कन्फ्यूजन पाया जाता है,

इसलिए एक मुसलमान के लिए फितनो के दौर मे आफ़ियत इसी में है कि अल्लाह और रसूल सलल्ललाहु अलयहि वसल्लम के हुक्म को‌ माने,क्योकि इन्सान के लिए किसी फायदे की चीज को हराम,और नुक़्सान की चीज़ को हलाल नहीं किया गया है, ये नुक़्सान और फ़ायदा हमेशा नंगी आंखों से नजर नहीं आता,कभी इसका असर इन्सान के अख़्लाक़ और किरदार पर भी पड़ता है,और हराम हलाल की चीज़ो का ज़्यादा ताल्लुक़ इसी से है,

किरदार और अख़्लाक़ ही इनसान को जानवरों से अशरफ़,अफ़ज़ल और बेहतर बनाता है,लेकिन ख़ास तौर से डार्विन के नज़रिए के बाद से जब इंसान और जानवरो का फ़र्क़ खतम हो‌ गया,इन्सान सिर्फ अपनी ख़्वाहिशों का ग़ुलाम बन कर रह गया, तो अख़्लाक़ी क़दरो और रिवायात की अहमियत उसके दिल दिमाग से निकल गयी, इसलिए इंसान‌ अपने मक़सदे ज़िन्दगी को भूलकर जानवर से बदतर होता चला जा रहा है ।

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